परमाणु हथियारों की खतरनाक होड़ ! - SATYAM NEWS

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Friday, July 31, 2020

परमाणु हथियारों की खतरनाक होड़ !

            

गत रोज पहले परमाणु हथियारों पर निगाह रखने वाली अंतर्राष्ट्रीय संस्था सिप्री (स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट)की ईयरबुक-2020 का यह खुलासा भारत की चिंता बढ़ाने वाला है। सुपर पावर बनने की होड़ में शामिल चीन के पास परमाणु हथियारों का विशाल जखीरा है और वहीं पाकिस्तान के पास भी भारत से ज्यादा एटमी हथियार उपलब्ध है।रिपोर्ट के मुताबिक भारत के परमाणु हथियार चीन के मुकाबले आधे से भी कम हैं। भारत के पास 150 तो चीन के पास 320 परमाणु हथियार हैं। चीन ने पिछले एक साल में 30 परमाणु हथियार बढ़ाए हैं।जबकि भारत ने सिर्फ 10 का इजाफा किया है। दूसरी ओर पाकिस्तान के पास भी 160 परमाणु हथियार हैं। यानी भारत से कहीं अधिक। जो सर्वाधिक चिंता की बात है वह यह कि पाकिस्तान बार-बार भारत को परमाणु हथियारों की धमकी देता है। वहीं चीन अब अपने परमाणु हथियारों का सार्वजनिक तौर पर प्रदर्शन करने लगा है।यह दोनों ही स्थिति में भारत के लिए खतरनाक है। ऐसे में भारत को चाहिए कि परमाणु हथियारों के खतरनाक होड़ में जुटे चीन और पाकिस्तान को दुनिया भर में बेनकाब करें ताकि उन पर दबाव बने। आज जब सीमा पर तनाव की स्थिति बनी हुई है और कभी भी विस्फोटक हालात बनने की संभावना कई गुना अधिक है ऐसे में भारत के पास चीन के मुकाबले परमाणु बमों की कमतर संख्या चिंतित करने वाला है।

बिडंबना यह भी है कि चीन और पाकिस्तान परमाणु हथियारों का जमावड़ा युद्ध के लिए कर रहे हैं। वहीं भारत परमाणु उर्जा के शांतिपूर्ण उपयोग का पक्षधर है। गौर करें तो भारत प्रारंभ से ही परमाणु शस्त्र नियंत्रण व निरस्त्रीकरण का समर्थक रहा है। भारत ने संयुक्त राष्ट्र में 1954 में ही स्टैंड स्टील एग्रीमेंट अर्थात ‘यथास्थिति वाले समझौते’ के माध्यम से सबसे पहले परमाणु शस्त्र नियंत्रण की आवाज उठायी जबकि अन्य राष्ट्र इस बारे में जागरुक नहीं थे। भारत हमेशा से एक परमाणु अस्त्रों से मुक्त विश्व गढ़ने का समर्थन और परमाणु शक्ति का उपयोग लोगों के जीवन स्तर को सुधारने व आर्थिक खुशहाली का पक्षधर रहा है। भारत ने परमाणुशक्ति संपन्न राष्ट्रों की परमाणु हथियारों के परीक्षण को जितना गंभीरता से विरोध किया है उतना ही अन्य किसी दूसरे राष्ट्र ने नहीं की है। परमाणु उर्जा के अंतर्राष्ट्रीय नियंत्रण के संबंध में नीति निर्धारण हेतु भारत ने दो बातों पर विशेष रुप से जोर दिया। एक इस नए उर्जा स्रोत के आर्थिक उपयोग की सभी को स्वतंत्रता हो तथा दूसरा इसको निरस्त्रीकरण से जोड़ा जाए। भारत निरस्त्रीकरण और शस्त्र नियंत्रण को एकदूसरे का पर्याय मानता है। शस्त्र नियंत्रण निरस्त्रीकरण का अनिवार्य अंग है। दोनों का मूल उद्देश्य अंतर्राष्ट्रीय समाज में हिंसा व शक्ति के प्रयोग को रोकना व सीमित करना है। जून 1982 में भारत ने संयुक्त राष्ट्र की महासभा में निरस्त्रीकरण पर पांच सूत्रीय ठोस कार्यक्रम प्रस्तुत किया जिसकी चतुर्दिक सराहना हुई। अक्सर भारत की परमाणु नीति को 1974 और 1998 के परमाणु परीक्षण से जोड़ते हुए उसे संदेह की परिधि में रखा जाता है। लेकिन यह तार्किक नहीं है।

वैश्विक समुदाय को समझना होगा कि यह भारत की आर्थिक आवश्यकता की पूर्ति और आत्मसुरक्षा के लिए बेहद आवश्यक था। इसलिए और भी कि चीन ने 1964 में परमाणु विस्फोट कर सामरिक रुप से असंतुलित कर दिया था। उस दौरान देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री ने भारत द्वारा परमाणु बम के बारे में विचार करने की बात कही थी। मौजूदा समय में भारत का तीन स्तरीय स्वदेशी परमाणु विकास का कार्यक्रम मूलतः शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए है। यह उर्जा उत्पादन एक अहम अंग है।चूंकि शीतोयुद्धोत्तर युग के आर्थिक सुधारों एवं विश्व में भूमंडलीकरण के बाद आए नए बदलावों ने परमाणु कार्यक्रमों को बहुत महत्वपूर्ण बना दिया। इस लिहाज से भारत को भी अपनी बढ़ती उर्जा जरुरतों को पूरा करने के लिए परमाणु संयंत्रों की स्थापना आवश्यक था। निःसंदेह आज की तारीख में भारत की परमाणु नीति का उद्देश्य अब उर्जा उत्पादन तक सीमित न रहकर संभावित शस्त्र उत्पादन से भी जुड़ गया है। लेकिन इसमें कोई बुराई नहीं है। इसलिए कि शीतयुद्धोत्तर युग में संघर्ष में आई कमी के बावजूद दक्षिण एशिया में शांति के युग का प्रारंभ नहीं हुआ है। वाह्य शक्तियों के हस्तक्षेप, विशेषकर अमेरिका की नीतियों में कोई क्रांतिकारी परिवर्तन नहीं होना, मध्य एशियाई गणराज्यों की उत्पत्ति, पाकिस्तान में आंतरिक अशांति, अफगानिस्तान की समस्या से किसी भी समय स्थिति नाजुक बन सकती है।

भारत के पड़ोसी देश विशेष रुप से चीन और पाकिस्तान दोनों परमाणु शस्त्रों से लैस हैं। अभी गत वर्ष ही पाकिस्तान के परमाणु वैज्ञानिक एक्यू खान ने धमकी भरे लहजे में कहा कि परमाणु बम से लैस पाकिस्तान के पास दिल्ली को पांच मिनट में निशाना बनाने की क्षमता है। गौरतलब है कि पाकिस्तान ने 1998 में परमाणु परीक्षण किया और उसी समय से लगातार भारत को धमकी दे रहा है। उधर, भारत-चीन संबंधों में सुधार के प्रयत्नों के बावजूद भी उत्तर-पूर्वी सीमा की सुरक्षा के संबंध में निश्चिंत नहीं हुआ जा सकता। बहरहाल भारत के परमाणु कार्यक्रम का उद्देश्य पाकिस्तान की तरह किसी देश को धमकी देना नहीं बल्कि रचनात्मक विकास और मानवता के कल्याण के लिए है। गौर करें तो आज विश्व भर में 70 हजार से अधिक परमाणु शस्त्र हैं और प्रत्येक शस्त्र की क्षमता हिरोशिमा और नागासाकी जैसे किसी भी शहर को एक झटके में मिटा देने में सक्षम है।

एक रिसर्च के मुताबिक इन शस्त्रों के जरिए दुनिया को एक दो बार नहीं बल्कि दर्जनों बार मिटाया जा सकता है। आंकड़ों पर गौर करें तो अमेरिका 1945 के बाद से हर नौ दिन में एक के औसत से परमाणु परीक्षण की है। आंकड़ों बताते हैं कि 1945 के बाद से दुनिया में कम से कम 2060 ज्ञात परमाणु परीक्षण हो चुके हैं जिनमें से 85 फीसद परीक्षण अकेले अमेरिका और रुस ने किया है। ये दोनों ही देश विश्व की महाशक्तियां हैं, और दुनिया के अधिकांश देश इन्ही दोनों देशों के खेमे में बंटे हुए हैं। इसमें से अमेरिका ने 1032, रुस ने 715, ब्रिटेन ने 45, फ्रांस ने 210, चीन ने 45 परीक्षण किए है। भारत और पाकिस्तान द्वारा भी 6 परमाणु परीक्षण किए जा चुके हैं। सिप्री की रिपोर्ट के मुताबिक रुस और अमेरिका के पास दुनिया के 90 प्रतिशत परमाणु हथियार हैं। रुस के पास 6375 तो अमेरिका के पास 5800 परमाणु हथियार हैं। गौरतलब है कि अमेरिका ने 16 जुलाई, 1945 को मैक्सिको के आल्मागार्दो रेगिस्तान में परमाणु बम का परीक्षण किया और उसके बाद से ही परमाणु युग की शुरुआत हुई। अमेरिका की देखा-देखी सोवियत संघ ने 1949 में, ब्रिटेन ने 1952 में, फ्रांस ने 1958 में तथा चीन ने 1964 में अपना पहला परमाणु परीक्षण किया। इस बिरादरी में भारत भी सम्मिलित हो गया जब उसने 18 मई, 1974 को पोखरन में अपना प्रथम भूमिगत परीक्षण किया। अब हालात यह है कि समूची दुनिया कभी न खत्म होने वाली परमाणु परीक्षणों की घुड़दौड़ में शामिल हो गयी है। विडंबना यह है कि परमाणु संपन्न देश परमाणु शस्त्र कटौती संधि के बावजूद भी इन घातक हथियारों में कमी लाने को तैयार नहीं हैं।

परमाणु अस्त्रों के उत्पादन को सीमित करने तथा उनके प्रयोग एवं उनके परीक्षण पर रोक लगाने के संबंध में संसार की दो महाशक्तियों के बीच 1967 की परमाणु अप्रसार संधि (एनपीटी) जिसे 12 जून 1968 को संयुक्त राष्ट्र महासभा ने भारी बहुमत से स्वीकृति प्रदान की और 5 मार्च 1970 से प्रभावी हो गयी। इस संधि के अंतर्गत यह व्यवस्था दी गयी कि कोई भी परमाणु संपन्न देश अकेले या मिलकर अपने अस्त्र किसी भी राष्ट्र को नहीं देंगे। संधि पर हस्ताक्षर करने वाला प्रत्येक राष्ट्र आणविक अस्त्रों की होड़ समाप्त करने एवं आणविक निःशस्त्रीकरण को प्रभावशाली बनाने के लिए बाध्य होगा। लेकिन यहां उल्लेखनीय तथ्य यह कि इस संधि के प्रारुप पर आपत्ति जताते हुए फ्रांस, इटली, जर्मनी और भारत ने हस्ताक्षर करने से मना कर दिया। भारत के अनुसार यह संधि भेदभावपूर्ण, असमानता पर आधारित एकपक्षीय एवं अपूर्ण है।

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